tag:blogger.com,1999:blog-16245948.post-1159436243046471992006-09-28T14:53:00.000+05:302006-09-28T15:40:40.060+05:302006-09-28T15:40:40.060+05:30चंडी चरित्र<a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/durga.1.jpg"><img style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; CURSOR: hand; TEXT-ALIGN: center" height="254" alt="" src="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/320/durga.0.jpg" width="289" border="0" /></a><br /><a href="http://photos1.blogger.com/blogger/4993/1519/1600/durga.0.jpg"></a>भाल निपट विशाल शशिमृग मीन खंजन लोचनी,<br />भाल बदन विशाल कोमल सकल विध्न विमोचनी ।<br />सिंह वाहिनी धनुष धारिणी कनक सेवत सोहिनी,<br />रूण्ड माल अरोल राजत् मुनिन के मन मोहिनी ।<br />एक रूप अनेक तेरो मैया गुणन की गिनती नहीं,<br />कछु ज्ञान अतः ही सुजान भक्तन भाव से विनती करी ।<br />वर वेष अनूड़ा खड़ग खप्पर अभय अंकुश धारिणी,<br />कर काज लाज जहाज जननी जनन के हित कारिणी ।<br />मंद हास प्रकाश चहूं दिस विंध्य वासिनी गाईये,<br />क्रोध तज अभिमान परिहर दुष्ट बुद्धि नसाईये ।<br />उठत बैठत चलत सोवत बार बार मनाईये,<br />चण्ड मुण्ड विनाशिनी जी के चरण हित चित्त लाईये ।<br />चंद्र फल और वृंद होते अधिक आनंद रूप हैं,<br />सर्व सुख दाता विधाता दर्श पर्श अनूप हैं ।<br />तू योग भोग विलासिनी शिव पार्श्व हिम गिरी नंदिनी,<br />दुरत तुरत निवारिणी जग तारिणी अद्य खंजिनी ।<br />आदि माया ललित काया प्रथम मधु कैटभ छ्ले,<br />त्रिभुवन भार उतारवे को महा महिषासुर मले ।<br />इंद्र चंद्र कुबेर वरूणो सुरन के आनंद भये,<br />भुवन चौदह मैया दश दिशन में सुनत ही सब दुख गये ।<br />धूम्रलोचन भस्म कीनो मैया क्रोध के ‘हुँ’कार सों,<br />हनी है सेना मैया सकल ताकी सिंह के भभकार सों ।<br />चण्ड मुण्ड प्रचण्ड दोऊ मैया प्रवल से अति भ्रष्ट हैं,<br />मुण्ड जिनके किए खण्डन असुर मण्डल दुष्ट हैं ।<br />रक्तबीज असुर अधर्मी आयो हैं दल जोड़ के,<br />शोर कर मरवे को धायो कियो रण घनघोर से ।<br />जय जय भवानी युक्ति ठानी सर्व शक्ति बुलाईके,<br />महा शुम्भ निशुम्भ योद्धा हन्यो खड़ग् बजाईके ।<br />परस्पर जब युद्ध माच्यो दिवस सों रजनी भई,<br />दास कारण असुर मारे मैया पुष्प घन वर्षा भई ।<br />चित्त लाई चंडी चरित्र पढ़त और सुनत जो निसदिन सदा,<br />पुत्र मित्र कलात्र सुख सों दुख न आवे डिग कदा ।<br />भुक्ति मुक्ति सुबुद्धि बहुधन धान्य सुख संपत्त लिए,<br />शत्रु नाश प्रकाश दुनिया आनंद मंगल जन्म लहें ।शालिनी नारंगhttp://www.blogger.com/profile/07725139668070862028noreply@blogger.com1