सोमवार, 18 जनवरी 2010

काँच की बरनी (Jar)और दो कप चाय

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी - जल्दी करने की इच्छा होती है , सब
कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के
चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , " काँच की बरनी और दो
कप चाय " हमें याद आती है ।



दर्शनशास्त्र (Philosophy) के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा
कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ...

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी बरनी ( Jar ) टेबल पर रखा और
उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें
एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची ... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या
बरनी पूरी भर गई ? हाँ ... आवाज आई ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे -
छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे - धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी
सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने
पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ ... कहा अब
प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले - हौले उस बरनी में रेत डालना
शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी
नादानी पर हँसे ... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी
पूरी भर गई ना ? हाँ .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा
.. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में
डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ...

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया –

इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो ....

टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे
, मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं ,

छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और

रेत का मतलब और भी छोटी - छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है ..

अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस
की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो
गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी ...

ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है ... यदि तुम छोटी - छोटी बातों के पीछे
पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों
के लिये अधिक समय नहीं रहेगा ... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये
तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो ,
सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल
फ़ेंको , मेडिकल चेक - अप करवाओ ... टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले
करो , वही महत्वपूर्ण है ... पहले तय करो कि क्या जरूरी है ... बाकी सब
तो रेत है ..

छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह
नहीं बताया कि " चाय के दो कप " क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले
.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ...

इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे ,
लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

सोमवार, 12 मार्च 2007

हम तो भैया ऐसे ही हैं.........

यहाँ हम तो से मेरा आशय हम हिंदुस्तानियों से है।  हम सब लोगों में कोई न कोई अच्छी या बुरी आदत अवश्य होती है।  यहाँ उन आदतों के बारे में बताया जा रहा है जो हम हिंदुस्तानियों में अमूनन तौर पर पाई जाती हैं।  हम लोग अपने घर से तो सारा कूड़ा निकाल देते हैं और उसका ढेर लगाते हैं पड़ोसी के दरवाजे पर या गली के नुक्कड़ पर ।  अपने घर-आँगन के फर्श को तो फिनायल वाले पानी से धोते हैं और सारा पानी जाकर जमा होता है पड़ोसी के घर के सामने।  सड़क पर या गाड़ी में चलते हुए फट से थूक देते हैं फिर चाहे वह थूक किसी राह चलते व्यक्ति पर ही क्यों न गिरे।  रेलगाड़ी में, बसों में मूँगफली के छिलके फैंकते हुए बिल्कुल नहीं हिचकते।  केले, संतरे खाकर छिलके रास्ते पर फैंकते हैं।  बेकार कागज़ की चिंदियाँ बनाकर मज़े से हवा में उड़ाते हैं।  सड़कों पर जमा बारिश के पानी में से बड़ी तेजी से गाड़ी निकालते हैं फिर चाहे गंदे पानी की उस बौछार से कोई राह चलता आदमी भीगे या दुपहिया पर बैठा आदमी।  जिस दीवार पर लिखा हो यहाँ पेशाब करना मना है वहीं आपको चार आदमी खड़े होकर भूमिगत पानी का स्तर बढ़ाते हुए दिख जाऎंगे।  अस्पताल, स्कूल के पास जहाँ लिखा हो यहाँ हार्न मत बजाएँ वहीं अधिकतर गाड़ी वाले बेसब्री से हार्न बजाते हुए दिख जाएँगे।  अपने घर छोटे भाई-बहनों या बच्चों की परीक्षा समाप्त हो गई तो हम फुल स्पीड पर गाने चलाएँगे फिर चाहे पड़ोसी के बच्चों की परीक्षा हो या उनके यहाँ कोई बीमार हो।  भले ही गाड़ियाँ खरीदे हुए 2-3 साल बीत जाएँ पर उसकी सीट पर चढ़े प्लास्टिक कवर नहीं उतारेंगे फिर चाहे उनसे कितना ही पसीना क्यों न आए।  हम लोग भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की बुराईयाँ तो करते हैं पर इस व्यवस्था से लड़ने की कोशिश नहीं करते।  हम रिश्वत देते हैं, दूर-दूर की रिश्तेदारियाँ निकालते हैं जिससे हमारा काम निकल जाए।  भले ही हमें दूर तक सड़क पर जाम ही नज़र आ रहा हो फिर भी हम हार्न लगातार तब तक बजाते हैं जब तक कि हमारे आगे की गाड़ी वाला अपने बैक व्यू मिरर में हमें घूर कर नहीं देखता।  समय की कद्र करना तो हमने जैसा सीखा ही नहीं।  किसी के यहाँ से हमें सुबह के नाश्ते का निमंत्रण मिला हो तो हम मज़े से लंच के समय तक पहुँचते हैं और फिर मुस्कराते हुए कहते हैं कि आपने तो सोचा भी नहीं होगा कि हम इतनी जल्दी आ जाएँगे।  तो बात है कि संवेदनशीलता की।  अगर हम दूसरे लोगों, समाज व पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हों तो हम सब इनमें से कोई भी आदत नहीं पालेंगे।  अगर मेरे इस लेख से आप में से कोई भी अपनी कोई बुरी आदत छोड़ दे तो मैं अपना लेखन सफल मानूँगी।  

गुरुवार, 21 दिसंबर 2006

कैलेंडर 2007

दोस्तों, लंबी छुट्टियों के बाद अब वापसी हुई है। आशा करती हूँ कि अब ब्लाग पर नियमित लिखने का यह सिलसिला ज़ारी रहेगा। पेश है वर्ष 2007 का कैलेंडर जिसमें साल के सभी त्योहार और अवकाश भी दिए गए हैं। डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए।

गुरुवार, 28 सितंबर 2006

चंडी चरित्र


भाल निपट विशाल शशिमृग मीन खंजन लोचनी,
भाल बदन विशाल कोमल सकल विध्न विमोचनी ।
सिंह वाहिनी धनुष धारिणी कनक सेवत सोहिनी,
रूण्ड माल अरोल राजत् मुनिन के मन मोहिनी ।
एक रूप अनेक तेरो मैया गुणन की गिनती नहीं,
कछु ज्ञान अतः ही सुजान भक्तन भाव से विनती करी ।
वर वेष अनूड़ा खड़ग खप्पर अभय अंकुश धारिणी,
कर काज लाज जहाज जननी जनन के हित कारिणी ।
मंद हास प्रकाश चहूं दिस विंध्य वासिनी गाईये,
क्रोध तज अभिमान परिहर दुष्ट बुद्धि नसाईये ।
उठत बैठत चलत सोवत बार बार मनाईये,
चण्ड मुण्ड विनाशिनी जी के चरण हित चित्त लाईये ।
चंद्र फल और वृंद होते अधिक आनंद रूप हैं,
सर्व सुख दाता विधाता दर्श पर्श अनूप हैं ।
तू योग भोग विलासिनी शिव पार्श्व हिम गिरी नंदिनी,
दुरत तुरत निवारिणी जग तारिणी अद्य खंजिनी ।
आदि माया ललित काया प्रथम मधु कैटभ छ्ले,
त्रिभुवन भार उतारवे को महा महिषासुर मले ।
इंद्र चंद्र कुबेर वरूणो सुरन के आनंद भये,
भुवन चौदह मैया दश दिशन में सुनत ही सब दुख गये ।
धूम्रलोचन भस्म कीनो मैया क्रोध के ‘हुँ’कार सों,
हनी है सेना मैया सकल ताकी सिंह के भभकार सों ।
चण्ड मुण्ड प्रचण्ड दोऊ मैया प्रवल से अति भ्रष्ट हैं,
मुण्ड जिनके किए खण्डन असुर मण्डल दुष्ट हैं ।
रक्तबीज असुर अधर्मी आयो हैं दल जोड़ के,
शोर कर मरवे को धायो कियो रण घनघोर से ।
जय जय भवानी युक्ति ठानी सर्व शक्ति बुलाईके,
महा शुम्भ निशुम्भ योद्धा हन्यो खड़ग् बजाईके ।
परस्पर जब युद्ध माच्यो दिवस सों रजनी भई,
दास कारण असुर मारे मैया पुष्प घन वर्षा भई ।
चित्त लाई चंडी चरित्र पढ़त और सुनत जो निसदिन सदा,
पुत्र मित्र कलात्र सुख सों दुख न आवे डिग कदा ।
भुक्ति मुक्ति सुबुद्धि बहुधन धान्य सुख संपत्त लिए,
शत्रु नाश प्रकाश दुनिया आनंद मंगल जन्म लहें ।

मंगलवार, 8 अगस्त 2006

असली-नकली


फ़ोटोग्राफ़ी पर रवि जी का लेख पढ़ने के बाद मैं भी एक फोटो यहाँ दे रही हूँ जो नोकिया 3230 के कैमरे (1.2 मेगापिक्सल) से लिया गया है। बताइए कौन असली है और कौन नकली?

सोमवार, 7 अगस्त 2006

युद्ध

एक शाम दादाजी अपने पौत्र से बैठे बात कर रहे थे। दादाजी बोले – आज मैं तुम्हें उस युद्ध के बारे में बताता हूँ जो हम सबके शरीर में दो शक्तियों के बीच होता है।
एक शक्ति बुराई है जिसका भोजन गुस्सा, जलन, द्वेष, घमंड, दुख, पछतावा, लालच, निराशा, झूठ, पाप, आक्रोश और अहंकार हैं। दूसरी शक्ति अच्छाई है जिसका भोजन खुशी, शांति, प्रेम, आशा, पवित्रता, मानवता, दयालुता, उदारता, सच, विश्वास, दया और सहानुभूति है।
पौत्र ने कुछ देर विचार कर अपने दादाजी से पूछा कि इस युद्ध में किस शक्ति की विजय होती है? दादाजी तुरंत बोले – उसी की जिसे तुम भोजन देते हो।

सोमवार, 29 मई 2006

नज़रों का धोखा!

अगर अपने दिमाग और आँखों को भ्रम में डालना चाहते हैं तो इन तस्वीरों को गौर से देखिए। ये हिलती हुई प्रतीत होती हैं पर हैं नहीं।

























और ये देखिए और बताइए कि ये रेखाएँ समानान्तर हैं या नहीं।










1. इस तस्वीर के मध्य में चार बिंदुओं को 30 सेकंड तक देखिए।
2. अब अपने पास की किसी दीवार पर देखिए।
3. क्या दिखा आपको? या कौन दिखा आपको?

मंगलवार, 16 मई 2006

एक सच्ची डरावनी कहानी (कमज़ोर दिल वाले न पढ़ें)

कृपया कमज़ोर दिल वाले न पढ़ें। यह एक सच्ची घटना है जो पिछले महीने लोनावाला के पास घटी।
एक युवक मुम्बई से पुणे अपनी कार से जा रहा था। जब वह घाट के पास पहुँचा तभी अनहोनी घटी। उसकी कार खराब हो गई और वहाँ दूर-दूर तक कोई नज़र भी नहीं आ रहा था। वह किसी कार से पास के कस्बे तक लिफ्ट लेने की आशा में सड़क के किनारे-किनारे चलने लगा। रात अँधेरी और तूफानी थी। पानी झमाझम बरस रहा था। जल्दी ही वह पूरी तरह भीग गया और काँपने लगा। उसे कोई कार नहीं मिली और पानी इतनी तेज बरस रहा था कि कुछ मीटर दूर की चीजें भी नहीं दिखाई दे रही थीं। तभी उसने एक कार को अपनी तरफ आते देखा जो उससे पास आकर धीरे हो गई। लड़के ने आव देखा न ताव, झट से कार का पिछला दरवाजा खोला और अंदर कूद गया। जब वह अपने मददगार को धन्यवाद देने के लिए आगे झुका तो उसके होश उड़ गए क्योंकि ड्राइवर की सीट खाली थी। आगे की सीट खाली और इंजन की आवाज़ न होने के बावजूद भी कार सड़क पर चल रही थी। लड़के ने तभी आगे सड़क पर एक मोड़ देखा। अपनी मौत नजदीक देख वह लड़का जोर-जोर से भगवान को याद करने लगा। तभी खिड़की से एक हाथ आया और उसने कार के स्टीयरिंग व्हील को मोड़ दिया। कार मोड़ से सकुशल आगे बढ़ गई। लड़का बुरी तरह भयभीत हो कर देखता रहा कि कैसे हर मोड़ पर खिड़की से एक हाथ अंदर आता और स्टीयरिंग व्हील को मोड़ देता। आखिरकार उस लड़के को कुछ दूरी पर रोशनी दिखाई दी। लड़का झट से दरवाजा खोल कर नीचे कूदा और सरपट रोशनी की तरफ दौड़ा। यह एक छोटा सा कस्बा था। वह सीधा एक ढाबे में रुका और पीने को पानी माँगा। फिर वह बुरी तरह रोने लगा। थोड़ी देर बाद सामान्य होने पर उसने अपनी भयानक कहानी सुनानी शुरु की। ढाबे में सन्नाटा छा गया कि तभी.............................
संता और बंता ढाबे में पहुँचे और संता लड़के की तरफ इशारा करके बंता से बोला कि अरे यही वह बेवकूफ लड़का है ना जो हमारी कार में कूदा था जब हम कार को धक्का लगा रहे थे।

बुधवार, 10 मई 2006

माँ तुझे सलाम!

एक बार जब एक बच्चा धरती पर जन्म के लिए तैयार था तो उसके मन में भय और आशंका के कई बादल उमड़ रहे थे। उसने भगवान से कहा कि मैंने सुना है कि आप मुझे जल्दी ही धरती पर भेज रहे हैं, पर मैं तो इतना छोटा और निशक्त हूँ तो वहाँ कैसे रहूँगा? भगवान ने कहा कि बहुत से फरिश्तों में से मैंने तुम्हारे लिए एक फरिश्ता चुना है जो धरती पर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है और जो तुम्हारा ख्याल रखेगा। बच्चे ने फिर पूछा कि यहाँ आपके पास तो मैं बस गाता और मुस्कराता हूँ और खुश रहता हूँ वहाँ मेरा क्या होगा? भगवान ने कहा कि वह फरिश्ता तुम्हारे लिए गीत गाएगा और इतना प्यार देगा कि तुम वहाँ भी खुश रहोगे। बच्चे ने फिर पूछा कि मैं वहाँ के लोगों की भाषा कैसे समझूँगा? भगवान ने कहा कि वह फरिश्ता तुम्हें नए और मीठे शब्द सिखाएगा और धैर्य व मेहनत से बोलना सिखाएगा। बच्चे ने फिर पूछा कि अगर मेरा आपसे बात करने का मन करेगा तो मैं क्या करूँगा? भगवान ने कहा कि वह फरिश्ता तुम्हें हाथ जोड़कर प्रार्थना करना सिखाएगा। बच्चा फिर बोला कि पर मैंने सुना है कि धरती पर बहुत से बुरे लोग हैं, मुझे उनसे कौन बचाएगा? भगवान ने उसे बाँहों में भरकर कहा कि वह फरिश्ता तुम्हारी उन बुरे लोगों से रक्षा करेगा चाहे उसे अपनी जान की बाजी क्यों न लगानी पड़े।

तभी स्वर्ग में शांति सी छा गई और धरती से आवाज़ें स्पष्ट सुनाई पड़ने लगीं। बच्चे ने कहा कि अब मैं धरती पर जाने लगा हूँ तो आप मुझे जल्दी से मेरे फरिश्ते का नाम बता दीजिए। भगवान बोले कि तुम्हारे फरिश्ते का नाम कोई मायने नहीं रखता क्योंकि तुम उसे केवल 'माँ' कहकर पुकारोगे।

सोमवार, 17 अप्रैल 2006

कुछ मज़ेदार तस्वीरें

आज अपने कंप्यूटर की साफ-सफाई करते हुए ये कुछ मज़ेदार तस्वीरें हाथ लगीं। सो पेश हैं-




क्लिक कीजिए फिर पूरी तस्वीर सिलेक्ट कीजिए (Control + A) और देखिए।






अगर स्पाईडरमैन हिंदी फिल्मों का हीरो होता तो कुछ यूँ होता ।





कलयुग के विश्वामित्र और मेनका ।








शिकारी खुद यहाँ शिकार हो गया । कलयुग में यह भी संभव है।









बंदर ही मनुष्य के पूर्वज हैं। विश्वास नहीं होता तो खुद ही देख लीजिए।






यारों की सवारी। यारों का साथ हो तो हर सफ़र सुहाना हो जाता है।

सोमवार, 10 अप्रैल 2006

अनुगूँज १८: मेरे जीवन में धर्म का महत्व

Akshargram Anugunjपहली बार अनुगूँज में भाग ले रही हूँ। जहाँ तक जीवन में धर्म के महत्व का प्रश्न है तो मैं यह मानती हूँ कि धर्म से ज्यादा अध्यात्म जीवन के लिए जरुरी है।

भारत में हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख धर्म और फिर इन धर्मों से जुड़ी हुई अनेक शाखाएँ हैं। भारत में चार हजार भाषाएँ हैं, जातियाँ हैं तो धर्म भी इतने ही हो सकते हैं क्योंकि धर्म का जाति से चोली-दामन का रिश्ता है। कैसे हैं ये धर्म? संकीर्ण विचारों से ग्रस्त, अनेकानेक मनगढ़न्त मान्यताओं व धारणाओं में कैद तथा सिर्फ अपने धर्माचरण के नियमों के प्रति प्रतिबद्ध। कार्ल मार्क्स ने सही कहा है कि “धर्म अफीम का नशा है”। लोगों को धर्म का नशा इतना चढ़ गया है कि उन्हें यह भान नहीं रहा कि वे मानव भी हैं। इन तथाकथित धर्म के अनुयायियों में करुणा, दया, अहिंसा, प्रेम, सहिष्णुता का नाम तक नहीं है। आडम्बर, पाखण्ड, घमण्ड का लबादा ओढ़कर महान आस्तिक कहलाते हैं। आँखों पर मानो कोई पट्टी बँधी है इसलिए अपने सामने का व्यक्ति मनुष्य नजर नहीं आता। इतना दम्भ। यह धर्म का नशा ही तो है।

चाहे आसाम का कामाख्या मंदिर हो या फिर कोलकाता का रुद्र काली का मंदिर, बिना बलि के वहाँ भोग प्रसाद नहीं चढ़ता। क्या ममता, करुणा-दया की साक्षात मूर्ति माँ इतनी कठोर और हिंसक हो गई है कि वह अपने जीवित, लाचार व मूक पशु रूपी बच्चों का भक्षण कर सकती है। इसी प्रकार कुर्बानी के नाम पर बकरे का निर्मम तरीके से सिर कलम किया जाता है, क्या खुदा इतना क्रूर है कि उसे खुथ करने के लिए एक निरीह पशु की हत्या की जाए? कोई भी धर्म यदि हिंसा की इजाजत देता है तो वह धर्म नहीं है। आज धर्म के नाम पह लोग एक दूसरे को मारने में जरा भी संकोच नहीं करते। “धर्म” शब्द संस्कृत की “धृ” धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना। जिस शक्ति ने हमें, हमारे शरीर के धारण कर रखा है उसी शक्ति ने सारे विश्व को, संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण कर रखा है वह है धर्म “धारयिते इति धर्म:”।

चूँकि इस शक्ति को हमने भुला दिया और सच्चा धर्म न जानकर पाखण्ड रुपी भूलभुलैया में भटक गए, इसलिए आज अध्यात्म की आवश्यक्ता है। अधि: आत्म-आत्मा में प्रवेश करना अध्यात्म है। हालांकि अध्यात्म को भी धर्म के ठेकेदारों ने नहीं छोड़ा है, धर्म का मुलम्मा चढ़ाकर अध्यात्म की दुकानदारी कर रहे हैं और यही कारण है कि लोगों में परिवर्तन नहीं होता। रत्नाकर डाकू वाल्मिकी बन गए, कितने ही दुराचारी, पापियों का अध्यात्म का मार्ग अपनाने से हृदय परिवर्तन हुआ तो क्यों नहीं आज भी अध्यात्म को अपनाया जाए।

अध्यात्म वह विद्या है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में “राजविद्या” कहकर संबोधित किया है। अध्यात्म की कोई शाखा नहीं है क्योंकि इसका सीधा तात्पर्य है प्रत्येक मनुष्य के अंत:करण में मौजूद “चैतन्य” से साक्षात्कार करना और जब वह यह अनुभूति कर लेगा तो स्वत: ही दिव्य व अलौकिक गुणों का विकास होगा, बुरे विचार और आदतों का परित्याग होगा तथा एक सुंदर समाज की रचना की बुनियाद मजबूत होगी। धर्म के नाम पर जब लोग भटक जाते हैं तो “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:” की बात भी चरितार्थ होती है और श्रीकृष्ण को अंतत: कहना भी पड़ा “सर्व धर्मान् परित्यज्यते मामेक शरणं ब्रज:” अर्थात् समस्त धर्मों का परित्याग कर मुझ एक की शरण में आ जा और यही संदेश अध्यात्म का है। अध्यात्म वह “ज्ञान” है जिसमें कि “स्वंय” का परिचय मिलता है और अंत:करण में प्रवेश कर केवल एक ही प्रभु की शरण का आश्रय।
जहाँ भेद-भाव, पाखंड और कर्मकांड का कोई स्थान ही नहीं है, करुणा, दया, प्रेम, शांति और आनंद जहाँ मौजूद है, जिनकी मनुष्यों को आवश्यकता है और धर्म चूँकि ये चीजें नहीं दे सकता, अध्यात्म द्वारा ही प्राप्त की जा सकती हैं इसीलिए आज धर्म नहीं, अध्यात्म जरुरी है।

मंगलवार, 21 मार्च 2006

जिंदगी

बनो ऐसे फूल जो पूरी तरह खिल कर मुरझाए
न कि ऐसा पेड़ जिस पर कभी बहार ही न आए ।
बनो ऐसी चिंगारी जो पल भर ही चमक कर खाक हो जाए
न कि ऐसी रोशनी जो किसी को राह ही न दिखा पाए ।
बनो ऐसा धूमकेतू जो अपनी पूरी आभा से दमके
न कि ऐसा ग्रह जो दूसरों की रोशनी से चमके ।
अपने समय का सदुपयोग करो न कि व्यर्थ गँवाओ ।
अपनी जिंदगी को पूरी तरह जियो न कि बस बिताओ ।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2006

रस्सी

यह कहानी एक ऐसे पर्वतारोही की है जो सबसे ऊँचे पर्वत पर विजय पाना चाहता था। कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद उसने अपना साहसिक अभियान शुरु किया। पर वह यह उपलब्धि किसी के साथ साझा नहीं करना चाहता था, अत: उसने अकेले ही चढ़ाई करने का निश्चय किया। उसने पर्वत पर चढ़ना आरंभ किया, जल्दी ही शाम ढलने लगी। पर वह विश्राम के लिए तम्बू में ठहरने की जगह अंधेरा होने तक चढ़ाई करता रहा। घने अंधकार के कारण वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। हाथ को हाथ भी सुझाई नहीं दे रहा था। चंद्रमा और तारे सब बादलों की चादर से ढके हुए थे। वह निरंतर चढ़ता हुआ पर्वत की चोटी से कुछ ही फुट के फासले पर था कि तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की तरफ गिरने लगा। गिरते हुए उसे अपने जीवन के सभी अच्छे और बुरे दौर चलचित्र की तरह दिखाई देने लगे। उसे अपनी मृत्यु बहुत नजदीक लग रही थी, तभी उसकी कमर से बंधी रस्सी ने झटके से उसे रोक दिया। उसका शरीर केवल उस रस्सी के सहारे हवा में झूल रहा था। उसी क्षण वह जोर से चिल्लाया: ‘भगवान मेरी मदद करो!’ तभी अचानक एक गहरी आवाज आकाश में गूँजी:

- तुम मुझ से क्या चाहते हो ?

पर्वतारोही बोला - भगवन् मेरी रक्षा कीजिए!

- क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि मैं तुम्हारी रक्षा कर सकता हूँ ?

वह बोला - हाँ, भगवन् मुझे आप पर पूरा विश्वास है ।

- ठीक है, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो अपनी कमर से बंधी रस्सी काट दो.....

कुछ क्षण के लिए वहाँ एक चुप्पी सी छा गई और उस पर्वतारोही ने अपनी पूरी शक्ति से रस्सी को पकड़े रहने का निश्चय कर लिया।

अगले दिन बचाव दल को एक रस्सी के सहारे लटका हुआ एक पर्वतारोही का ठंड से जमा हुआ शव मिला । उसके हाथ रस्सी को मजबूती से थामे थे... और वह धरती से केवल दस फुट की ऊँचाई पर था।


और आप? आप अपनी रस्सी से कितने जुड़े हुए हैं । क्या आप अपनी रस्सी को छोड़ेंगे? भगवान पर विश्वास रखिए। कभी भी यह नहीं सोचिए कि वह आपको भूल गया है या उसने आपका साथ छोड़ दिया है । याद रखिए कि वह हमेशा आपको अपने हाथों में थामे हुए है।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2006

चाह

आकाश के कोने में टंगे उस छोटे से धूप के टुकड़े को उतार लाना चाहती हूँ,
जिससे हट जाए मन का सारा अँधकार ।
बादलों में सिमटी उस पानी की बूँद को पाना चाहती हूँ,
जिससे मिट जाए यह अनबुझी प्यास ।
उड़ते पंछियों के परों को अपनाना चाहती हूँ,
जिससे यह दिल भी भर सके उड़ान ।
तितलियों से फूलों का रस लेना चाहती हूँ,
जिससे जीवन में भर सकूँ मिठास ।
दिल में बंद बातों को शब्दों में सहेजना चाहती हूँ,
जिससे कुछ भी न रह जाए अनकहा ।
हर पल को पूरी तरह जीना चाहती हूँ,
जिससे गम न हो कि जिंदगी को क्यों नहीं जिया ।

बुधवार, 25 जनवरी 2006

आँखों की जाँच

क्या आपको साफ़ दिखाई देता है? यह जाँचने के लिए यह सरल सा टेस्ट करिए –

1. पहले अपनी एक आँख बंद कीजिए।
2. अब अपने mouse pointer को लाल “!” पर ले जाइए।
3. अब right click करके select all चुनिए।
4. अब आपको परिणाम दिखाई देगा।

बुद्धू !

कोई तुम्हें कुछ भी करने को कहता है तो तुम अपना दिमाग लगाए बिना वह काम कर लेते हो।
तुम्हारी आँखें तो ठीक हैं पर तुम्हारा दिमाग ज़रूर ठीक नहीं है।
हा, हा, हा, हा, ही, ही, ही, ही। कभी-कभी अपने आप पर भी हँस लेना चाहिए।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2005

सोमवार, 26 दिसंबर 2005

पिता का आशीर्वाद

एक बार एक युवक अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाला था।  उसकी बहुत दिनों से एक शोरूम में रखी स्पोर्टस कार लेने की इच्छा थी।  उसने अपने पिता से कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने पर उपहारस्वरूप वह कार लेने की बात कही क्योंकि वह जानता था कि उसके पिता उसकी इच्छा पूरी करने में समर्थ हैं।  कॉलेज के आखिरी दिन उसके पिता ने उसे अपने कमरे में बुलाया और कहा कि वे उसे बहुत प्यार करते हैं तथा उन्हें उस पर गर्व है।  फिर उन्होंने उसे एक सुंदर कागज़ में लिपटा उपहार दिया ।  उत्सुकतापूर्वक जब युवक ने उस कागज़ को खोला तो उसे उसमें एक आकर्षक जिल्द वाली भगवद् गीतामिली जिसपर उसका नाम भी सुनहरे अक्षरों में लिखा था।  यह देखकर वह युवक आगबबूला हो उठा और अपने पिता से बोला कि इतना पैसा होने पर भी उन्होंने उसे केवल एक भगवद् गीतादी।  यह कहकर वह गुस्से से गीता वहीं पटककर घर छोड़कर निकल गया।

बहुत वर्ष बीत गए और वह युवक एक सफल व्यवसायी बन गया।  उसके पास बहुत धन-दौलत और भरापूरा परिवार था।  एक दिन उसने सोचा कि उसके पिता तो अब काफी वृद्ध हो गए होंगे।  उसने अपने पिता से मिलने जाने का निश्चय किया क्योंकि उस दिन के बाद से वह उनसे मिलने कभी नहीं गया था।  अभी वह अपने पिता से मिलने जाने की तैयारी कर ही रहा था कि अचानक उसे एक तार मिला जिसमें लिखा था कि उसके पिता की मृत्यु हो गई है और वे अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर गए हैं।  उसे तुरंत वहाँ बुलाया गया था जिससे वह सारी संपत्ति संभाल सके।

वह उदासी और पश्चाताप की भावना से भरकर अपने पिता के घर पहुँचा।  उसे अपने पिता की महत्वपूर्ण फाइलों में वह भगवद् गीताभी मिली जिसे वह वर्षों पहले छोड़कर गया था।  उसने भरी आँखों से उसके पन्ने पलटने शुरू किए।  तभी उसमें से एक कार की चाबी नीचे गिरी जिसके साथ एक बिल भी था।  उस बिल पर उसी शोरूम का नाम लिखा था जिसमें उसने वह स्पोर्टस कार पसंद की थी तथा उस पर उसके घर छोड़कर जाने से पिछले दिन की तिथि भी लिखी थी।  उस बिल में लिखा था कि पूरा भुगतान कर दिया गया है।  

कई बार हम भगवान की आशीषों और अपनी प्रार्थनाओं के उत्तरों को अनदेखा कर जाते हैं क्योंकि वे उस रूप में हमें प्राप्त नहीं होते जिस रूप में हम उनकी आशा करते हैं।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2005

साइबर मंदिर

हम में से अधिकतर लोग किसी न किसी कारणवश प्रतिदिन मंदिर जाकर भगवान को माथा नहीं टेक सकते। अत: अब प्रस्तुत है - साइबर मंदिर जिससे आप घर या कार्यालय कहीं भी केवल कंप्यूटर के द्वारा ही मंदिर जा सकते हैं। मंदिर जाने के लिए केवल नीचे दी गई कड़ी पर क्लिक कीजिए ।

सोमवार, 5 दिसंबर 2005

रेत और पत्थर

एक बार दो दोस्त रेगिस्तान में से होकर कहीं जा रहे थे । रास्ते में उनमें किसी बात पर बहस हो गई और एक दोस्त ने दूसरे दोस्त को थप्पड़ मार दिया । जिस दोस्त को थप्पड़ मारा गया था वह बहुत दुखी हुआ पर उसने बिना कुछ बोले रेत पर लिखा, आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे थप्पड़ मारा। थोड़ा और आगे चलने पर उन्हें एक झील दिखाई दी और उन दोनों ने पानी में नहाने का विचार बनाया । पहला दोस्त जिसे थप्पड़ लगा था, दलदल में फँस गया और डूबने लगा । तब दूसरे दोस्त ने उसकी जान बचाई । डूबने से बचने पर उसने एक पत्थर पर लिखा, आज मेरे सबसे अच्छे दोस्त ने मेरी जान बचाई। इस पर दूसरे दोस्त ने पूछा कि जब मैनें तुम्हें थप्पड़ मारा तब तुमने रेत पर लिखा पर जब मैंने तुम्हारी जान बचाई तब तुमने पत्थर पर लिखा, ऐसा तुमने क्यों किया ? इस पर पहले दोस्त ने उत्तर दिया, जब कोई तुम्हें दुख पहुँचाता है तो उसे रेत पर लिखना चाहिए जिससे क्षमा की आँधी उसे मिटा सके। पर जब कोई तुम्हारे साथ भलाई करता है तो उसे पत्थर पर लिखना चाहिए जिससे समय की हवा भी उसे मिटा न सके।
अपने साथ किए गए बुरे बर्ताव को रेत पर और भलाई को पत्थर पर लिखना सीखिए।

शनिवार, 26 नवंबर 2005

कुछ सरल व्यायाम

मित्रों,

आपकी पीठ को मज़बूत बनाने के लिए तथा आपको चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए कुछ सरल व्यायाम प्रस्तुत हैं।