मंगलवार, 7 फ़रवरी 2006

चाह

आकाश के कोने में टंगे उस छोटे से धूप के टुकड़े को उतार लाना चाहती हूँ,
जिससे हट जाए मन का सारा अँधकार ।
बादलों में सिमटी उस पानी की बूँद को पाना चाहती हूँ,
जिससे मिट जाए यह अनबुझी प्यास ।
उड़ते पंछियों के परों को अपनाना चाहती हूँ,
जिससे यह दिल भी भर सके उड़ान ।
तितलियों से फूलों का रस लेना चाहती हूँ,
जिससे जीवन में भर सकूँ मिठास ।
दिल में बंद बातों को शब्दों में सहेजना चाहती हूँ,
जिससे कुछ भी न रह जाए अनकहा ।
हर पल को पूरी तरह जीना चाहती हूँ,
जिससे गम न हो कि जिंदगी को क्यों नहीं जिया ।

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

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