शनिवार, 3 सितंबर 2005

कुछ पंक्तियाँ

नमस्कार दोस्तों, मेरे पन्ने में आपका स्वागत है ।
मेरी लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ आपके सामने प्रस्तुत हैं जो अलग-अलग मनोस्थितियों को दर्शाती हैं ।

सुबह उठने से रात सोने तक, हर वक्त काम ही काम है
अरमानों का यह हश्र देखकर, न चैन न ही आराम है ।
शायद कभी यह मसरुफ़ियत खत्म होगी,
और हँसी फिर से मेरी हमदम होगी ।


जल रही हैं आँखें, सिर भी है भारी
यह तो है आजकल बड़ी कॉमन बीमारी ।
दिल्ली जो कभी शान थी, अब है प्रदूषण की मारी
चारों तरफ वाहनों का कोलाहल है भारी ।
ऐसे में कोई क्या करे, किससे कहे
क्योंकि सभी की तो जल रही हैं आँखें
और सिर भी है भारी ।


When the sun sets
Birds rest in their nests
Time to go home comes
Then my heart jumps
Not because I have to go home
But coz I am not alone
You are there always
To make me feel that way
All your care and affection
Like a mirror I give reflection
May God bless us with a life of dignity
And you remain mine till the eternity.

2 टिप्‍पणियां:

Raman ने कहा…

Its really very nice to see that you have created some of the very nicest poems as it displays the essence of your life.
Keep it up.

Laxmi N. Gupta ने कहा…

Very upbeat, Shalini. Keep it up. Visit my blog sometime.