सोमवार, 10 अप्रैल 2006

अनुगूँज १८: मेरे जीवन में धर्म का महत्व

Akshargram Anugunjपहली बार अनुगूँज में भाग ले रही हूँ। जहाँ तक जीवन में धर्म के महत्व का प्रश्न है तो मैं यह मानती हूँ कि धर्म से ज्यादा अध्यात्म जीवन के लिए जरुरी है।

भारत में हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई, सिक्ख धर्म और फिर इन धर्मों से जुड़ी हुई अनेक शाखाएँ हैं। भारत में चार हजार भाषाएँ हैं, जातियाँ हैं तो धर्म भी इतने ही हो सकते हैं क्योंकि धर्म का जाति से चोली-दामन का रिश्ता है। कैसे हैं ये धर्म? संकीर्ण विचारों से ग्रस्त, अनेकानेक मनगढ़न्त मान्यताओं व धारणाओं में कैद तथा सिर्फ अपने धर्माचरण के नियमों के प्रति प्रतिबद्ध। कार्ल मार्क्स ने सही कहा है कि “धर्म अफीम का नशा है”। लोगों को धर्म का नशा इतना चढ़ गया है कि उन्हें यह भान नहीं रहा कि वे मानव भी हैं। इन तथाकथित धर्म के अनुयायियों में करुणा, दया, अहिंसा, प्रेम, सहिष्णुता का नाम तक नहीं है। आडम्बर, पाखण्ड, घमण्ड का लबादा ओढ़कर महान आस्तिक कहलाते हैं। आँखों पर मानो कोई पट्टी बँधी है इसलिए अपने सामने का व्यक्ति मनुष्य नजर नहीं आता। इतना दम्भ। यह धर्म का नशा ही तो है।

चाहे आसाम का कामाख्या मंदिर हो या फिर कोलकाता का रुद्र काली का मंदिर, बिना बलि के वहाँ भोग प्रसाद नहीं चढ़ता। क्या ममता, करुणा-दया की साक्षात मूर्ति माँ इतनी कठोर और हिंसक हो गई है कि वह अपने जीवित, लाचार व मूक पशु रूपी बच्चों का भक्षण कर सकती है। इसी प्रकार कुर्बानी के नाम पर बकरे का निर्मम तरीके से सिर कलम किया जाता है, क्या खुदा इतना क्रूर है कि उसे खुथ करने के लिए एक निरीह पशु की हत्या की जाए? कोई भी धर्म यदि हिंसा की इजाजत देता है तो वह धर्म नहीं है। आज धर्म के नाम पह लोग एक दूसरे को मारने में जरा भी संकोच नहीं करते। “धर्म” शब्द संस्कृत की “धृ” धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना। जिस शक्ति ने हमें, हमारे शरीर के धारण कर रखा है उसी शक्ति ने सारे विश्व को, संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण कर रखा है वह है धर्म “धारयिते इति धर्म:”।

चूँकि इस शक्ति को हमने भुला दिया और सच्चा धर्म न जानकर पाखण्ड रुपी भूलभुलैया में भटक गए, इसलिए आज अध्यात्म की आवश्यक्ता है। अधि: आत्म-आत्मा में प्रवेश करना अध्यात्म है। हालांकि अध्यात्म को भी धर्म के ठेकेदारों ने नहीं छोड़ा है, धर्म का मुलम्मा चढ़ाकर अध्यात्म की दुकानदारी कर रहे हैं और यही कारण है कि लोगों में परिवर्तन नहीं होता। रत्नाकर डाकू वाल्मिकी बन गए, कितने ही दुराचारी, पापियों का अध्यात्म का मार्ग अपनाने से हृदय परिवर्तन हुआ तो क्यों नहीं आज भी अध्यात्म को अपनाया जाए।

अध्यात्म वह विद्या है जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में “राजविद्या” कहकर संबोधित किया है। अध्यात्म की कोई शाखा नहीं है क्योंकि इसका सीधा तात्पर्य है प्रत्येक मनुष्य के अंत:करण में मौजूद “चैतन्य” से साक्षात्कार करना और जब वह यह अनुभूति कर लेगा तो स्वत: ही दिव्य व अलौकिक गुणों का विकास होगा, बुरे विचार और आदतों का परित्याग होगा तथा एक सुंदर समाज की रचना की बुनियाद मजबूत होगी। धर्म के नाम पर जब लोग भटक जाते हैं तो “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:” की बात भी चरितार्थ होती है और श्रीकृष्ण को अंतत: कहना भी पड़ा “सर्व धर्मान् परित्यज्यते मामेक शरणं ब्रज:” अर्थात् समस्त धर्मों का परित्याग कर मुझ एक की शरण में आ जा और यही संदेश अध्यात्म का है। अध्यात्म वह “ज्ञान” है जिसमें कि “स्वंय” का परिचय मिलता है और अंत:करण में प्रवेश कर केवल एक ही प्रभु की शरण का आश्रय।
जहाँ भेद-भाव, पाखंड और कर्मकांड का कोई स्थान ही नहीं है, करुणा, दया, प्रेम, शांति और आनंद जहाँ मौजूद है, जिनकी मनुष्यों को आवश्यकता है और धर्म चूँकि ये चीजें नहीं दे सकता, अध्यात्म द्वारा ही प्राप्त की जा सकती हैं इसीलिए आज धर्म नहीं, अध्यात्म जरुरी है।

11 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

अनुगूंज में आपका पहला प्रयास सफल रहा, क्योंकि आपने अपने विचारों को बहुत ही स्पष्टता से रखा हैं. धार्मिक पाखण्ड पर सब ने लिखा पर आध्यात्मिकता कि ओर किसी का ध्यान नहीं गया था.

Jitendra Chaudhary ने कहा…

बहुत सुन्दर, शालिनी जी, आपने अपनी बात बहुत सरल ढंग से रखी है। एक तरफ़ देवी मन्दिरों मे बलि चढना और उनके भक्तो का अन्नजल छोड़कर उपवास करना, घोर विरोधाभास ही तो है। पता नही हम कब इस अन्धविश्वास से बाहर निकलेंगे?

युगल मेहरा ने कहा…

अभिनन्दन
शालिनि जी
धर्म के उपर आपके विचार अच्छे लगे।
बस मैं इतना कहना चाहता हूँ कि आध्यात्म धर्म का ही एक हिस्सा है।
आपने स्वयं ही लिखा है कि जिस शक्ति ने हमें, हमारे शरीर के धारण कर रखा है उसी शक्ति ने सारे विश्व को, संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण कर रखा है वह धर्म है।

अनूप शुक्ला ने कहा…

बढ़िया लिखा।आगे भी अनुगूंज पर लेख लिखतीं रहें।

शालिनी नारंग ने कहा…

लेख पसंद आने के लिए व उत्साह वर्धन के लिए आप सब का बहुत-बहुत धन्यवाद।

Pankaj Jangid ने कहा…

शालिनी जी, बहुत ही उच्च कोटी का लेख लिखने के लिए बहुत बहुत बधाइ।

मैं युगल जी की बात से भी सहमत हूँ।

बेनामी ने कहा…

धर्म का अर्थ - सत्य, न्याय एवं नीति (सदाचरण) को धारण करके कर्म करना एवं इनकी स्थापना करना ।
व्यक्तिगत धर्म- सत्य, न्याय एवं नीति को धारण करके, उत्तम कर्म करना व्यक्तिगत धर्म है ।
असत्य, अन्याय एवं अनीति को धारण करके, कर्म करना अधर्म होता है ।
सामाजिक धर्म- मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । ईश्वर या स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है । वर्तमान में न्यायपालिका भी यही कार्य करती है ।
धर्म को अपनाया नहीं जाता, धर्म का पालन किया जाता है । धर्म पालन में धैर्य, संयम, विवेक जैसे गुण आवश्यक है ।
धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस स्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
व्यक्ति विशेष के कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म -
राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
जीवन सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक व अनन्त काल तक रहेगा ।
धर्म एवं मोक्ष (ईश्वर की उपासना, दान, पुण्य, यज्ञ) एक दूसरे पर आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है ।
धार्मिक ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है । by- kpopsbjri

बेनामी ने कहा…

धर्म का अर्थ - सत्य, न्याय एवं नीति (सदाचरण) को धारण करके कर्म करना एवं इनकी स्थापना करना ।
व्यक्तिगत धर्म- सत्य, न्याय एवं नीति को धारण करके, उत्तम कर्म करना व्यक्तिगत धर्म है ।
असत्य, अन्याय एवं अनीति को धारण करके, कर्म करना अधर्म होता है ।
सामाजिक धर्म- मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । ईश्वर या स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है । वर्तमान में न्यायपालिका भी यही कार्य करती है ।
धर्म को अपनाया नहीं जाता, धर्म का पालन किया जाता है । धर्म पालन में धैर्य, संयम, विवेक जैसे गुण आवश्यक है ।
धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस स्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
व्यक्ति विशेष के कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म -
राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
जीवन सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक व अनन्त काल तक रहेगा ।
धर्म एवं मोक्ष (ईश्वर की उपासना, दान, पुण्य, यज्ञ) एक दूसरे पर आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है ।
धार्मिक ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है । by- kpopsbjri

बेनामी ने कहा…

वर्तमान युग में पूर्ण रूप से धर्म के मार्ग पर चलना किसी भी आम मनुष्य के लिए कठिन कार्य है । इसलिए मनुष्य को सदाचार एवं मानवीय मूल्यों के साथ जीना चाहिए एवं मानव कल्याण के बारे सोचना चाहिए । इस युग में यही बेहतर है ।

krishnmurari shakywal ने कहा…

Kya kare yaaro ho jata he ...

SUNIL JAIN ने कहा…

सभी प्राणी जीना चाहते है, मरना कोई नहीं चाहता I